रियलिटी शोज़ की मृगतृष्णा

पिछले दो ढाई दशकों से रियलिटी शोज़ का चलन आतंकित करने के स्तर तक पैठ बनाये है। प्रतियोगिताएं पहले भी होती थीं,हार जीत भी होती थी,बच्चे दुखी भी होते थे परंतु थोड़ी देर को; अगले दिन से ही नई तैयारियों में फिर जुट जाते थे और अच्छे प्रदर्शन के लिए ,किन्तु टी वी पर 25 साल पहले एकाध कार्यक्रम रियलिटी के क्या प्रसारित हुये धीरे धीरे कर के झड़ी लगती गयी चैंनल बढ़ते गये और उनमें मसालेदार आकर्षण डालने के लिए रियलिटी शो माध्यम बनते गये। इनमें कुछ बड़ों के लिए थे,कुछ सेलिब्रिटी के लिए थे वहाँ तक तो मनोरंजन की बात समझ आती है लेकिन जितने शो बच्चों से जुड़े थे वे सब के सब सिर्फ और सिर्फ बच्चों की मासूमियत भुना रहे थे और अब ये प्रतिस्पर्धा स्वस्थ नहीं रही, बच्चों को पता होता है कि वे बहुत दूर तक देखे जा रहे हैं और जीतना उनके लिये गर्व तो बाद में बनता है अहम पहले बन जाता है। यदि बच्चा हारे तो रो रो कर इमोशनल ब्लैकमेल करना सिखाया जाता है, बहुत कठिनाई से सब किया तो और चार चाँद लग जाते हैं सही करे गलत करे वोट मांगना तो सीख जाते हैं पर गीत संगीत नृत्य का स्तर क्या है इसपर किसी की नज़र नहीं होती ।

वर्तमान में स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि बच्चे कुछ सीखना ही नहीं चाहते,और अभिभावकों के लिए ये प्रतिष्ठा बन गयी है कि उनका बच्चा बिना सीखे बहुत बड़ा कलाकार है मतलब सीधे शब्दों में ये है कि अब सीखने सिखाने का समय नहीं रहा अब जन्मजात कलाकारो का दौर आ चुका है। अब कलाकारों के लिये गुरु की आवश्यकता नहीं रही ,अब सिर्फ इसीका चलन हो गया है कि कुछ भी सीखे बिना बहुत बड़े परफॉर्मर हैं, चलिए मान ले कि कला वास्तव में एक जन्मजात गुण है फिरभी सीधे सीधे शब्दों में कहा जाये तो जो अंतर लेबर और स्किल्ड लेबर में होता है,या हर विशेष पद के लिए विशेष योग्यता होती है वही कला पर भी लागू होता है।

रियलिटी शोज़ में सिर्फ और सिर्फ बच्चों की मासूमियत का सौदा हो रहा है,उसे बेंच कर आयोजक और चैनल तो मालामाल हो रहे हैं और बच्चों के खाने खेलने और खूब सीखने का समय कुछ दिनों की चमक दमक और शोहरत में गुम हुआ जारहा है जो उन्हें कला और व्यक्तित्व के विकास की ओर जाने ही नहीं दे रहा नतीजा जब बच्चे को वास्तव में काम की आवश्यकता होती है तब तक वह प्रतिभावान ,चरित्रवान और गुणवान कलाकार के स्थान पर मनोरोगी बन चुकता है और अपनी छद्म शोहरत जिसे वह पहले सम्भाल नहीं सकता था और अब उसी के नशे में और आड़ में पुनः स्थापित होना चाहता है किंतु उसे पता ही नहीं होता कि उसके भीतर लंबी रेस का घोड़ा बनने के गुणों का तो कभी विकास ही नहीं हुआ।

—–डॉ अलका बाजपेयी—–

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